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असम में रह रहे तकरीबन 40 लाख लोगों के लिए 30 जुलाई का दिन एक आपदा से कम न था

प्रभावितों में मुसलमान ही नहीं हिन्दू भी शामिल

असम में रह रहे तकरीबन 40 लाख लोगों  के लिए 30 जुलाई का दिन एक आपदा से कम न था। ये वे मनुष्य हैं जिनकी भारतीय नागरिकता संदिग्ध हो गई है क्योंकि उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुसार तैयार की गई राष्ट्रीय नागरिक सूची में उनका नाम नहीं है। एक ही परिवार में अगर बेटे का नाम है तो माँ का नहीं, बहन का है तो भाई का नहीं। इससे इन लाखों लोगों में भीषण बेचैनी है क्योंकि इन्हें नहीं मालूम कि सूची में नाम होने का अर्थ इनके भविष्य के लिए क्या होगा। क्या वे निगरानी शिविरों में डाल दिए जाएँगे, क्या उन्हें भारत से बाहर जाने को कहा जाएगा? क्या उनका मताधिकार समाप्त हो जाएगा? क्या राजकीय संसाधन आज से उनके लिए नहीं होंगे? क्या वे अपने ही पड़ोसियों के लिए अनचाहे हो जाएँगे? जो हो, कामू के कथापात्रों की तरह वे खुद अपनी निगाह में संदिग्ध हो चुके हैं।

असम एकमात्र प्रदेश है जिसके लिए ऐसी सूची बनाई गई है। इसकी ऐतिहासिक विशेषता, इसमें बाहर से आने वाले लोगों की संख्या के कारण स्थानीय आबादी में खो जाने या अपनी ही ज़मीन से बेदखल हो जाने का डर हमेशा से एक वाजिब कारण माना जाता रहा है कि उनकी पहचान की जाए जो बाहरी हैं। भारत और पाकिस्तान के बँटवारे के बाद लोगों के सीमा के आर पार आने जाने का सिलसिला खत्म न हुआ। असम निवासियों को लगता रहा कि विभाजन का बोझा उन्हें अधिक ढोना पड़ा है और जो उनका था उसमें काफी कुछ की साझेदारी बाद में आनेवालों से करनी पड़ी है उन्हें। 1951 में नागरिकों की एक सूची बनाई गई। माना गया कि इसमें दर्ज लोग असली नागरिक हैं। उसके बाद बांग्ला देश के निर्माण के कारण बड़ी संख्या में लोग सीमा पार से आए। जाहिर है इनमें हिंदू और मुसलमान दोनों थे। असंम के लोगों का कहना है कि धर्म से मतलब नहीं। जो किसी भी प्रकार अपना सम्बन्ध इस सूची से न दिखा सकें उन्हें बाहरी मानना चाहिए। लंबे वक्त तक चला असम आन्दोलन इन्हीं बाहरी लोगों की पहचान की मांग पर आधारित था। 1985 के असम समझौते के मुताबिक़ आख़िरी तारीख 24 मार्च, 1971 तय हुई। जो इसके बाद के हैं, वे बाहरी हैं।

राष्ट्र राज्य बनने की विडंबना यह है कि यदि क़ानून और कागजात के मुताबिक़ आप नागरिक नहीं हैं तो आप अमनुष्यमें बदल जाते हैं। बाहरी, विदेशी, भारत के लिए बांग्लादेशी जैसे शब्द गाली की तरह हैं। नागरिकता के कायदों में प्रशिक्षित न होने कारण जिनके पास अपने होने का कोई राजकीय प्रमाण पत्र (जन्म , स्कूल , आदि) नहीं है वे खुद ब खुद सूची से बाहर हो जाते हैं। आश्चर्य नहीं कि बड़ी संख्या में इस सूची से 48 साल की मैमूना या 52 साल की रूप बानू जैसी औरतें बाहर हैं। इनकी संख्या इतनी अधिक है कि इसे संकट की जगह आपदा कहना ही उचित है। शादीशुदा औरतों को नियम के मुताबिक़ कोई प्रमाण पेश करना है जो उनके पिता, पति से उनका संबंध साबित कर सके। लेकिन अगर उनके पास न विवाह का, न जन्म का प्रमाण हो तो राज्य की एजेंसी क्या करे? फिर ऐसी औरतें कहाँ जाएँ? क्या वे गायब हो जाएँ ?

प्रभावितों में अधिक संख्या मुसलमानों की है लेकिन हिंदू भी इस सूची से बाहर हैं। मुसलमानों में बेचैनी बढ़ने का एक वाजिब कारण भारत सरकार का वह प्रस्ताव है जिसके मुताबिक़ मुसलमानों को छोड़कर कर बाकी धर्मों के वैसे लोगों को जो अगल बगल के मुल्कों से किसी कारण भारत में आ गए हैं, भारतीय नागरिकता दी जा सकेगी। मुसलमानों को खासकर इस अधिकार से वंचित कर देने का कारण स्पष्ट है। इस प्रस्ताव के चलते हिंदू चाहे किसी देश के हों उनका भारत पर स्वाभाविक और पहला हक है। उसी तरह मुसलमानों का इस देश पर हक नहीं है, वे इस देश से बराबरी के व्यवहार की उम्मीद नहीं कर सकते।

असम के वरिष्ठ बुद्धिजीवी हीरेन गोहाईं ठीक ही कहते हैं कि यह भारत को इस्राइल बनाने की साजिश है। इस्राइल का कहना है कि दुनिया के किसी भी हिस्से में रहनेवाले यहूदी का स्वाभाविक अधिकार इस्राइल पर है और यदि वह चाहे उसे इस्राइली नागरिकता दी जाएगी।

असम में लेकिन इसका विरोध हो रहा है। वह धर्म निरपेक्ष असमिया पहचान पर आधारित विरोध है। फिर भी समझना कठिन नहीं है कि आज के माहाल में कौन सी आबादी अधिक घबराई और डरी हुई है!

इस वातावरण में नागरिकता सूची के जारी होने का तात्पर्य और सामाजिक प्रभाव भी साधारण समय से अलग होगा। केंद्र और राज्य सरकारें भले कहें कि जिनके नाम सूची में नहीं हैं उन पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी। उनके आश्वासन पर इसलिए भरोसा मुश्किल है कि एक लंबा अभियान उस दल ने चलाया है जिसकी आज सरकार है जिसमें बांग्लादेशी के नाम पर मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाई और गहरी की गई है। राजकीय संस्थाओं का स्वाभाविक दुराव मुसलमान झेल रहे हैं।

क्या इस मानवीय संकट का सामना हम कर पाएँगे? क्या हम समझ पाएँगे कि राष्ट्र आप्रवासियों से बनते हैं। मनुष्य चाहता है कि उसके जड़ हो लेकिन वह दरअसल पांवोंवाला प्राणी है। यानी आना जाना, अजनबी जगह को अपना बनाना और अजनबी लोगों का अपना होना उसकी फितरत है। नागरिकता जैसी अवधारणा इस मानवीय स्वभाव को पूरी तरह से समो नहीं पाती।यह बात उन सबको समझनी होगी जो इन 40 लाख सूची-विस्थापितों की आशंका से सहानुभूति नहीं रखते। एक मित्र ने ठीक ही पूछा कि जो भारतीय 5 साल अमरीका में रहकर उसकी नागरिकता चाहते हैं, वे 40 साल से भारत में रहते आ रहे लोगों को वतन बदर करने की वकालत करते वक्त क्या अपने भीतर के विरोधाभास पर कभी विचार करेंगे? जब यह विचार शुरू होगा तब उत्तरनागरिकता का मनुष्य युग आरंभ हो पाएगा।

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