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प्रोफेसरों की नियुक्ति में जातीय भेद-भाव, डीयू ने कहा, नहीं है उपयुक्त एससी, एसटी अभ्यर्थी

डीयू के कुल 264 प्रोफेसरों में मात्र तीन अनुसूचित जाति से, अनुसूचित जनजाति का कोई प्रतिनिधित्व नहीं

संसदीय समिति ने इस बात को मानने से इनकार कर दिया है जिसमें यह कहा गया था कि दिल्ली विश्वविद्यालय में प्नोफेसरों की बहाली के लिए अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए निर्धारित पद उपयुक्त अभ्यर्थियों की कमी की वजह से खाली है। समिति ने कहा कि एससी-एसटी में योग्य अभ्यर्थियों की कमी नहीं है और डीयू में इन खाली पदों को भरा जाए।

दरअसल, एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली विश्वविद्यालय के कुल 264 प्रोफेसरों में से मात्र तीन प्रोफेसर ऐसे हैं जो समाज के वंचित समुदायों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और उनमें भी तीनों अनुसूचित जाति से हैं लेकिन अनुसूचित जनजाति से कोई भी नहीं।

डीयू में प्रोफेसरों, एससोसिएट प्रोफेसरों और असिस्टेंट प्रोफेसरों के पदों पर एससी-एसटी के इतने कम प्रतिनिधित्व को लेकर जब सवाल किया गया तो विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने जवाब में कहा था कि एससी-एसटी में उपयुक्त अभ्यर्थियों की कमी है और इसलिए निर्धारित सीटें खाली हैं।

द वायर की एक रिपोर्ट के अनुसार संसद में बुधवार को अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के कल्याण संबंधी मानव संसाधन मंत्रालय की एक रिपोर्ट में कहा गया कि समिति इस अवलोकन से नाराज़ है कि दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसरों,एसोसिएट प्रोफेसरों और असिस्टेंट प्रोफेसरों के पदों पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है।

समिति ने विश्वविद्यालय के कथन का खंडन करते हुए कहा कि वह एससी-एसटी में उपयुक्त अभ्यर्थियों की कमी की बात को नहीं मानती है। समिति ने विश्वविद्यालय को दिए अपने सुझाव में कहा कि डीयू में खाली पदों को नियमित रिक्तियों से भरा जाए ताकि कम से कम पहले से चली आ रही (बैकलॉग) रिक्तियों को भरा जा सके।

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