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भुखमरी- कुपोषण रोकने में नेपाल और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों से भी पीछे क्यों हुआ भारत?

भारत की भुखमरी और उसके लाखों लोगों के कुपोषण का सबसे बड़ा कारण उन हुक्मरानों की उदासीनता है, जो भूख की पीड़ा को कभी समझ ही नहीं पाए.

न्यू इंडिया के लिए यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि अथाह धन और बड़बोलेपन के बावजूद हमारा देश अभी भी भूख और कुपोषण के मामले में अपने पड़ोसी देशों से काफ़ी पिछड़ा है. यह बात तब और शर्मनाक हो जाती है, जब सरकारी गोदामों में चावल और गेहूं सड़ रहे हों. 2019 में जारी हुए ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की बहुत ही चिंताजनक तस्वीर सामने आई है. भूख से लड़ने के मामले में भारत अपने पड़ोसी बांग्लादेश, नेपाल और पाकिस्तान से भी पीछे है.

किसी व्यक्ति के लिए एक स्वस्थ और सामान्य जीवन जीने के लिए जरूरी कैलोरी पर्याप्त मात्रा में ना मिल पाना ही भूख है. इससे मानवीय त्रासदी की एक हृदय-विदारक तस्वीर सामने आती है, जहां मां-बाप अपने बच्चों को भूख से तड़पते और कुपोषण का शिकार होते हुए देखते हैं. कई बार इस कुपोषण की वज़ह से उनके बच्चों की मौत भी हो जाती है.

भूख और कुपोषण दो कारणों से राष्ट्रीय शर्म की बात है. पहला कारण यह कि प्रयास करें तो इसे पूरी तरह से रोका जा सकता है. संवेदनशीलता के साथ तैयार की गई लोक कल्याण की ऐसी नीतियों को लागू करके हम भूख से लड़ सकते हैं. देश में अनाज का संरक्षण हमारी जरूरत से कई गुना ज्यादा है. अपने 15 साल के गृह युद्ध के बावजूद नेपाल और आंतरिक अस्थिरता के बावजूद पाकिस्तान ने अच्छा प्रदर्शन करके भारत के पिछड़ेपन की ओर ध्यान दिलाया है. ग्लौबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट हमारे लिए शर्म का कारण इसलिए भी है कि इतना बुरा प्रदर्शन होने के बावजूद भी देश की जनता इसे लेकर चिंतित नहीं है.

ग्लोबल हंगर इंडेक्स के 117 देशों की सूची में भारत 102 नंबर पर है. यह रिपोर्ट चार मानकों पर आधारित है- कुपोषण, शिशु मृत्यु दर, पांच साल से कम उम्र वाले बच्चे का उनके उम्र के हिसाब से कम वजन और ऐसे बच्चे जिनकी लंबाई उनके उम्र के हिसाब से कम है.

इस रिपोर्ट में शामिल सभी देशों में “उम्र के हिसाब से बच्चों के वजन” के मामले में भारत की स्थिति सबसे बुरी है. 2008 से 2012 के बीच भारत 16.5 प्रतिशत से बढ़कर 20.8 प्रतिशत पर आ गया है. “उम्र के हिसाब से बच्चों की लंबाई” के मामले में भी भारत का प्रदर्शन काफ़ी बुरा रहा है.

यह रिपोर्ट हमें इस बात का एहसास भी कराता है कि कैसे बांग्लादेश और नेपाल जैसे देश अपने से कई गुना ज्यादा धनी भारत से आगे हैं. बांग्लादेश की सफलता का कारण है कि उसने गरीबों के कल्याण की कई सारी योजनाएं लागू की. सरकार ने शिक्षा, स्वच्छता और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में भी बढ़िया काम किया. इससे वहां के लोगों की आय में बढ़ोतरी हुई.  इसी तरह नेपाल में भी सरकार ने आम जनों की आर्थिक स्थिति, मातृत्व शिक्षा, स्वच्छता, स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों पर ध्यान दिया गया, जिसके कारण कुपोषण से लड़ने में उसकी स्थिति बेहतर हुई.

hunger index India
भारत की भुखमरी और कुपोषण का सबसे बड़ा कारण उन हुक्मरानों की उदासीनता है, जो भूख की पीड़ा को कभी समझ ही नहीं पाए. (चित्र साभार: नताशा बधवार)

दक्षिण एशियाई देशों के साथ तालमेल बिठाकर चलने के लिए भारत को कौन से कदम उठाने चाहिए? इसका जवाब तलाशने की कोशिश सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज द्वारा जारी 2018-19 के भारत बहिष्करण रिपोर्ट में मेरे, दीपा सिन्हा और पार्थ श्रीमाली द्वारा की गई है.

हमने पाया कि हमारे देश की सबसे बड़ी विडंबना है कि भोजन की समस्या से सबसे अधिक वे लोग जूझ रहे हैं, जो खुद उत्पादक की श्रेणी में आते हैं. जैसे- खेतीहर मजदूर, बटाईदार, सीमांत और छोटे किसान, मछली उत्पादन में शामिल लोग तथा लकड़ी चुनने वाला समुदाय. भुखमरी ख़त्म करने के लिए हमें भोजन उत्पादकों को पर्याप्त मेहनताना देना होगा. हमारा मानना है कि देश में तत्काल किसानों की आय बढ़ाने, न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देने और फ़सल बीमा करने की जरूरत है. किसानों को मिलने वाले कृषि लोन के दायरे को भी बढ़ाने की जरूरत है. खेतीहर मजदूरों के लिए भूमि सुधार से जुड़े क़दम भी उठाए जाने चाहिए. इसके साथ-साथ एक विस्तृत और प्रभावी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना चलाना जरूरी है, जिसमें लघु सिंचाई और वनरोपण पर विशेष ध्यान दिया गया हो. इन सबके अलावा हमें रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी, जिससे खेती के वातावरण पर आए संकट से निपटा जा सके.

असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की बड़ी आबादी भी भूख और कुपोषण को झेल रही है. बेरोज़गारी के संकट से निपटे बिना हम भुखमरी की समस्या से नहीं लड़ सकते. ऐसे में श्रम कानूनों में सुधार, काम करने का बेहतर वातावरण और सभी कामगारों की सामाजिक सुरक्षा की गारंटी देना भी आवश्यक हो जाता है. हमारा मानना तो यह भी है कि हमें एक शहरी रोज़गार गारंटी योजना की भी जरूरत है, जिसे शहरी क्षेत्रों में रह रहे ग़रीबों, झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले और बेघर लोगों के कल्याण को ध्यान में रखकर लागू किया जाए. इस योजना में बच्चों, विकलांगों और बुजुर्गों की देखभाल करने वाले सेक्टर में भी रोज़गार सृजित होंगे.

जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) को भी सभी लोगों के लिए (आयकरदाताओं को छोड़) लागू किया जाना चाहिए. पीडीएस में सिर्फ अनाज ही नहीं बल्कि दाल और खाद्य तेलों का भी वितरण हो. इसके बाद हमें पीडीएस को एक विकेंद्रीकृत प्रणाली के रूप में सामने लाना होगा, जहां कई प्रकार के फ़सलों को जमा करके स्थानीय स्तर पर उन्हें बांटा जा सके. बच्चों के स्कूल में मिलने वाले भोजन और स्कूल जाने से पहले उन्हें मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता में भी सुधार की जरूरत है. इसके लिए उचित बजट निर्धारित हो और बच्चों को डेयरी उत्पाद, अंडे और फल जैसे पोषक पदार्थों दिए जाएं. सामाजिक सुरक्षा की पहल करते हुए असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले कामगारों के लिए सार्वभौमिक (सबके लिए) पेंशन योजना, अपने नवजातों की देखभाल करने में सक्षम बनाने के लिए असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं को भी भत्ता देने की जरूरत है. इसके साथ-साथ बेघर बच्चों और बाल श्रमिकों के लिए आवासीय स्कूल खोलने की भी आवश्यकता है.

कुपोषण का एक मात्र कारण भोजन की कमी नहीं है, बल्कि कई बार गंदा पानी पीने की वजह से तथा सफ़ाई और स्वास्थ्य सुविधाओं में कमी की वजह से भी खाना पच नहीं पाता है और यह भी कुपोषण का कारण बनता है. तमाम दावों के बावजूद असलियत यह है कि आज भी लोगों के पास शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं है और लोग खुले में शौच करने को मजबूर हैं. कुपोषण के मामले में भारत के बुरे प्रदर्शन का एक कारण यह भी है. हमें “स्वास्थ्य सुविधाओं की सुरक्षा” के अधिकार की भी तत्काल जरूरत है, जिससे रोगियों को मुफ़्त इलाज़, स्वास्थ्य जांच की सुविधा और दवाएं दी जा सके.

हम इन बातों से पहले से ही वाकिफ़ हैं, लेकिन फिर भी भारत बच्चों को कुपोषण से बचाने, बेघर लोगों,  विधवा औरतों और शोषित जातियों को सामाजिक सुरक्षा देने में नाकाम रहा है. हमारी आर्थिक नीतियां आज भी एलीट क्लास के लोगों के जाल में फंसी है, जिसे बड़े उद्योगपतियों को ध्यान में रखकर बनाया जाता है. इन नीतियों से किसानों और कामग़ारों को बाहर रखा गया है. लोगों के सामाजिक अधिकार छिने गए हैं और जनता को ठगा गया है.

भारत की भुखमरी और उसके लाखों लोगों के कुपोषण का सबसे बड़ा कारण उन हुक़्मरानों की उदासीनता है, जो भूख की पीड़ा को कभी समझ ही नहीं पाए. हमारे संस्कृति-सभ्यता के कण-कण में रची-बसी असमानता के परिणामस्वरूप ही हम भुखमरी और कुपोषण से लड़ने में नाकाम रहे हैं.

यह लेख 28 अक्टूबर 2019 को द इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में “नेशनल डिसॉनर” शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है. लेखक एक मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं. हिन्दी में इस लेख का अनुवाद अभिनव प्रकाश ने किया है.

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