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भूलने के लिए 3 पीढियां लग जाती हैं, इस लिंचिंग के पागलपन को ख़त्म करिए – सेना के दिग्गज ने मोदी को लिखा पत्र (पढ़ें पत्र)

लगातार हो रहे सांप्रदायिक दंगों के डर का प्रभाव देश पर पड़ रहा है

एक सेना दिग्गज की तरफ से भारत के माननीय प्रधानमंत्री को खुला पत्र

माननीय प्रधानमंत्री,

1971 के लोंगेवाला युद्ध के दिग्गज की तरफ से जय हिन्द।

आप मुझे सन् 2002 से जानते हैं जब मैंने गुजरात में शांति स्थापित करने वाले बल का नेतृत्व किया था जब वहाँ हिंसा की आग ने पुरे राज्य को जकड़ा हुआ था। आपसे मेरी कई बार मुलाकात हुई जब मैं अलीगढ़ मुस्लिम युनिवेर्सिटी का कुलपति था। मैंने आपको दो बार अपने मन की पीड़ा बताई थी। एक बार आपके मंत्री-मंडल के एक सदस्य द्वारा मेरे साथ ख़राब व्यवहार करने पर। मैंने आपको कहा था कि एक पूर्व सैनिक और एक मुख्य विश्वविद्यालय का प्रमुख होने के नाते मैं सम्मान और शिष्टाचार का हकदार हूँ। दूसरी बार मैंने आपको मेरे खिलाफ विश्वविद्यालय के कोष से 120 करोड़ रुपये का घोटाला करने की अफवाह के बारे में बताया था जिसे मीडिया ने भी बहुत तूल दी। आपके शब्दों ने मेरा आत्मविश्वास और हिम्मत बढ़ाई। आपने बस इतना ही कहा था, “जाकर कह दीजिये कि मैं आपको पिछले 15 सालों से जानता हूँ।”

सर, मैं फिर से ‘गौ रक्षकों’ द्वारा समाज के पिछड़े और कमज़ोर वर्गों के साथ किये जा रहे बर्ताव के लिए अपना दुःख ज़ाहिर करने के लिए लिख रहा हूँ। आप ही वह व्यक्ति हैं जो इस पागलपन को बंद करवा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में किये गए निंदा के बावजूद हेट-क्राइम्स में कमी नहीं आई है, मुख्यतः कुछ नेताओं और पुलिस के सहपराधिता की वजह से। उन्हें सशस्त्र बालों के समावेशी और निष्पक्ष स्वभाव से सीखना चाहिए।

मैं एक किताब लिख रहा हूँ जिसका नाम है ‘सरकारी मुसलमान’ जिसका जल्द ही विमोचन होगा। उसके हवाले से मैं बताना चाहता हूँ कि क्यों मेरे परिवार ने भारत में रहने का निर्णय किया:

‘विभाजन एक और सदमा था जो मेरे परिवार ने झेला। वो सदस्य जो मुस्लिम लीग के वफादार थे, वो सब पाकिस्तान चले गए। मेरे अपने परिवार को हमारे समाज के समावेशी स्वभाव और विशालहृदयता पर पूरा भरोसा था। कुछ समय पहले तक हमारा ये भरोसा क़ायम रहा। हमारे शहर सरधना (ज़िला- मेरठ) में कभी दंगे नहीं हुए थे खासकर मेरे नाना के उस क्षेत्र में दबदबे की वजह से। उन्होंने वहाँ रह रहे सभी समुदायों को दंगों में शामिल ना होने की कड़ी चेतावनी दी हुई थी। फिर भी अपने बचपन में विभाजन के दौरान हुए अशांति, आगजनी और हत्याओं की डरावनी आपबीती सुनता था। इसका मुझ पर असर होता था हालाँकि मैंने इसके बारे में कभी बात नहीं की। मैं अपने अंदर से यह डर राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, खडकवासला में आकर ही निकाल पाया। इस महान संस्थान में मेरा बहुत अच्छे से स्वागत हुआ, मेरे साथ अच्छा और सामान बर्ताव किया गया बावजूद इसके कि मैं अपने पूरे 250 कैडेट्स के कोर्स में अकेला मुसलमान था।

मैंने और मेरी पत्नी ने इस बात का हमेशा ख़याल रखा कि हम अपने बच्चों के सामने विभाजन के इस डरावने रूप के बारे में कभी बात न करें। मेरे माता-पिता पर जिन्होंने उसे झेला, मेरे भाई-बहन और मुझ पर जिन्होंने उसके बारे में सुना, सब पर असर पड़ा था। इसका प्रभाव हमारे बच्चों पर नहीं पड़ा क्योंकि हमने इस बारे में घर पर कभी चर्चा नहीं की। इसलिए माँ-बाप के लिए बहुत ज़रूरी है कि वो अपने बच्चों के मन में नफरत और फूट ना डालें। यह जो लगातार हो रहे सांप्रदायिक दंगों का डर है उसी प्रभाव देश पर पड़ रहा है। पीड़ित परिवारों को ऐसा कुछ भी भूलने में तीन पीढ़ियाँ लग जाती हैं। जिन पर भी दंगों का बहुत खराब असर होता है उनका उस देश में कोई हिस्सेदारी नहीं रह जाता जहां उन्होंने जन्म लिया है। इसका असर हमारे देश के बारीकी से बुने ताने-बाने पर निश्चित रूप से पड़ेगा।”

मैं एक ऐसे व्यक्ति को लिख रहा हूँ जिसके पास धैर्य और दृढ निश्चय है और जो बहुत ही इमानदार व्यक्ति है। मैं ये इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि नेल्सन मंडेला जूनियर द्वारा कही गयी एक बात का मुझ पर बहुत गहरा असर पड़ा है, “आखिरकार, हमें अपने दुश्मनों की बातें याद नहीं रहेंगी बल्कि हमारे दोस्तों की चुप्पी याद रहेगी।”

अत्यंत सम्मान के साथ,

आपका आहत नागरिक 

लेफ्टिनेंट जनरल ज़मीर उद्दीन शाह (सेना दिग्गज)

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