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प्रणब बोले तो बहुत लेकिन कहा क्या!

प्रणब बाबू ने शायद यह न सोचा कि उनका भाषण इस देश के मुसलमान, ईसाई और दलित भी सुन रहे हैं।

बोले तो बहुत लेकिन कहा क्या! राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय पर उसके सबसे महत्त्वपूर्ण प्रशिक्षण शिविर में संघ की विचारधारा में दीक्षित स्वयंसेवकों को दीक्षांत व्याख्यान देते हुए पूर्व राष्ट्रपति ने भली लगने वाली अच्छी बातें कहीं. लेकिन वे बात भी बात क्या जो मकतूल को तसल्लीबख्श मालूम हो लेकिन कातिल की भी उससे कोई हतक न हो! यह फन आजमाया हमारे प्रणब मुखर्जी ने जिन्हें कल शाम से कांग्रेस और सारे आलिम फाजिल हाथोहाथ लिए घूम रहे हैं यह कहते हुए कि मुखर्जी बाबू ने संघ को उसके गढ़ में जाकर आईना दिखा दिया!

अव्वल तो जैसा प्रणब मुखर्जी की बेटी ने कहा, वही ठीक है कि रह जाएँगी तस्वीरें और लफ्ज़ फ़ना हो जाएँगे. लकिन प्रणब मुखर्जी ने सनद छोड़ी आने वाली पीढ़ियों के लिए अपने हाथ से लिखी जिससे कोई भ्रम न रह जाए. उनके मुरीद कह रहे हैं हाथ मलते हुए, बस! यह न करना चाहिए था उन्हें! लेकिन यही तो इब्तदा थी नागपुर के सफ़र की. प्रणब मुखर्जी केशव बलिराम हेडगेवार के घर गए और वहाँ रही किताब में भाव विभोर होकर लिखा, “मैं भारत माता के महान सपूत को श्रद्धांजलि देने आया हूँ.”

[perfectpullquote align=”full” bordertop=”false” cite=”” link=”” color=”” class=”” size=””]अगर मुसलमानों को ‘यवन सर्प’ कहनेवाले और गैर हिंदुओं को यह चेतावनी देनेवाले कि “वे यह न भूलें कि वे हिंदुओं के हिन्दुस्तान में रह रहे हैं,” महान हो सकते हैं तो हमें महानता के मायने बदल देने चाहिए. फिर हिटलर और मुसोलिनी क्यों न महान हों! लेकिन वे महान तो हैं हीं हेडगेवार और गोलवलकर और उनकी वारिसों की निगाह में![/perfectpullquote]

भले ही अब उन्होंने खुलेआम यह कहना बंद कर दिया हो! दिलचस्प यह है कि हिटलर को अपना आदर्श माननेवाले संघ के लिए अब उन यहूदियों का देश आदर्श है जिनका आख़िरी निबटारा करने का इरादा हिटलर का था. तो आदर्श दरअसल नस्लकुशी का विचार है जो संघ की रगों में पलता है। प्रणब बाबू जिस शिक्षा शिविर को संबोधित कर रहे थे, उसमें शामिल सभी स्वयंसेवक इसे जनसंहार के विचार के अभ्यासी हैं। यही शिक्षा सरस्वती शिशु मंदिरों औ शाखाओं में दी जाती है। भारत को शुद्ध करने की। विकृतियों से मुक्त करने की। और क्या कहना होगा कि यह विकृति क्या है!

प्रणब मुखर्जी ने एक आज्ञाकारी लेकिन रट्टू विद्यार्थी की तरह नेहरू की राष्ट्र की परिकल्पना को सतहीढंग से पेश किया. नेहरू भारत को खोज रहे थे, अंग्रेजों से लड़ते हुए 5000 साल की अविरल संस्कृति की महानता का उल्लेख अगर वे करें या और कोई तो हम उन्हें समझ सकते हैं लेकिन 1947 के बाद अब जब गंगा और साबरमती का पानी बह नहीं, सूख चुका है, हमें इतिहास पर अलग तरीक़े से बात करनी होगी। हमें अपनी परंपरा की सहिष्णुता की जगह उसकी नींव में दबा दी गई चीख़ों को सुनने की कोशिश करनी होगी।

इक़बाल ने कहा होगा कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। लेकिन क्या हमें नहीं मालूम कि यह हस्ती अनेकानेक हस्तियों को मिटाकर खड़ी की गई थी। औरतें पूछती हैं और दलित पूछते हैं कि इस भारतीय संस्कृति में हमारा स्वर कहाँ है। नेहरू के बाद सत्तर साल तक राष्ट्र का निर्माण जारी है और दलितों , आदिवासियों, मुसलमानों और ईसाइयों ने उसमें अपनी जगह के लिए जद्दोजहद की है। लेकिन प्रणब मुखर्जी से यह उम्मीद करना कि वे राष्ट्रवाद की इन उलझनों का ज़िक्र करें, कुछ ज़्यादती है उनके साथ।

फिर भी जब वे प्राचीन भारत पर लम्बा वक़्त गुज़ार लेने के बाद जब मध्यकाल में पहुँचे तो क्यों उन्हें सिर्फ़ “मुसलमान आक्रांता” याद आए, क्यों वे अकबर का नाम भी न ले सके । क्या यह इत्तफ़ाक़ था या नागपुर की इतिहास दृष्टि का लिहाज़ था जो पूर्व राष्ट्रपति कर रहे थे। ताज्जुब नहीं कि संघ के लोगों को सबसे अधिक पसंद उनके भाषण का यही हिस्सा आया। उनमें से एक ने उल्लसित होकर कहा कि देखो, हम न कहते थे, ये हमलावर थे, कोई हमें बिरयानी खिलाने न आए थे!

राष्ट्रवाद अगर प्रणब बाबू के व्याख्यान का कोई अर्थ इसलिए नहीं है या वह वायवीय है तो इसलिए कि वह संघ के इतिहास की समझ की सीधी आलोचना नहीं करता। उन्होंने विलयन के सिद्धांत की बात की, जिससे संघ को कोई ऐतराज़ नहीं है। विविधता में एकता अगर अभी सरसंघ चालक कर रहे हैं तो हमें सोचना पड़ेगा कि इसे हमने कितना पोला बना दिया है या कितना खींच डाला है कि अब इसका कोई अर्थ ही नहीं रह गया है।

अगर मुसलमानों पर हो रहे हमलों का ज़िक्र करना शिष्टता के विरुद्ध था, तो प्रणब बाबू शिलांग में मजहबी सिखों पर हो रहे हमलों के हवाले से ही संकीर्ण भूमिपुत्रवाद या मूलवाद की आलोचा कर सकते थे।

प्रणब बाबू ने शायद यह न सोचा कि उनका भाषण इस देश के मुसलमान, ईसाई और दलित भी सुन रहे हैं। वे शायद यह चाहते होंगे कि उनपर जो रोज़ हमले हो रहे हैं, प्रणब बाबू उनकी भयावहता को एक शब्द हिंसा में न निपटा दें। हत्या को हत्या कहा जाना चाहिए । घृणा हर कोई हर किसी से नहीं कर रहा। घृणा दलितों , मुसलमानों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ फैलायी जा रही है । इस घृणा का स्रोत संघ और उसके लोग हैं। यह कहना या इसकी ओर इशारा करना भी सभ्यता विरुद्ध होता!

लेकिन हम प्रणब बाबू पर खामखाह नाराज़ हैं। असल समस्या संघ में है। अगर यह सत्ता I तो संघ के दर पर और भी लोग मत्था टेकते दिखलाई पड़ेंगे। प्रणब बाबू की नागपुर में उपस्थिति का अर्थ ही है कि संवैधानिक नैतिकता का बोध शून्य होता जाता रहा है। हम सभ्यता का अर्थ भी भूल चले हैं। उसे वापस हासिल करने का संघर्ष लम्बा और कठिन है।

 

Apoorvanand is a professor at the Hindi Department of the University of Delhi.

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